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FSSAI का शराब कंपनियों पर बड़ा चाबुक, एंटीक्विटी, रॉयल चैलेंज और ओल्ड मोंक के चुनिंदा वेरिएंट्स पर बैन

नई दिल्ली: देश के खाद्य सुरक्षा नियामक, भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने एक सख्त कदम उठाते हुए भारत में बिकने वाले कुछ सबसे मशहूर व्हिस्की तथा रम ब्रांड्स के चुनिंदा वेरिएंट्स की बिक्री पर तुरंत प्रभाव से पाबंदी लगा दी है।

रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह कार्रवाई डियाजियो इंडिया की यूनाइटेड स्पिरिट्स, इनब्रू बेवरेजेज तथा मोहन रॉकी स्प्रिंगवॉटर द्वारा बनाई जाने वाली शराब पर की गई है। नियामक की जांच में यह खुलासा हुआ है कि जिन ड्रिंक्स का स्वाद प्राकृतिक तरीके और लंबे समय तक स्टोर (एजिंग प्रोसेस) करके आना चाहिए था, उनमें कंपनियों द्वारा कृत्रिम (आर्टिफिशियल) फ्लेवर की मिलावट की जा रही थी।

🧪 प्राकृतिक एजिंग के बजाय मिलाया जा रहा था नकली फ्लेवर, लैबोरेटरी जांच में खुला राज

दरअसल, अच्छी शराब अपनी गुणवत्ता, इस्तेमाल किए गए कच्चे माल और उसे सहेज कर रखने की लंबी अवधि (मैचुरेशन) से पहचानी जाती है।

लेकिन एफएसएसएआई की लैबोरेटरी जांच में पता चला है कि कुछ मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स अपने उत्पादों में रम जैसा स्वाद लाने के लिए अलग से ‘रम फ्लेवर’ तथा व्हिस्की के लिए ‘व्हिस्की फ्लेवर’ की मिलावट कर रही थीं। नियामक ने देर रात जारी अपने बयान में स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शराब बनाने की ऐसी कोई भी मान्यता प्राप्त प्रक्रिया नहीं है, जहां रम में रम का ही कृत्रिम फ्लेवर डाला जाए। ऐसा करना सीधे तौर पर उत्पादन के तय मानकों का उल्लंघन है।

🛑 इन नामी व्हिस्की और रम ब्रांड्स के वेरिएंट्स पर लागू हुआ प्रतिबंध

इस कड़े फैसले का असर कई नामी कंपनियों के उत्पादों पर पड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश में यूनाइटेड स्पिरिट्स द्वारा बनाई जाने वाली ‘एंटीक्विटी ब्लू व्हिस्की’ तथा ‘रॉयल चैलेंज व्हिस्की’ पर यह प्रतिबंध लागू होगा।

इसी राज्य में इनब्रू बेवरेजेज द्वारा उत्पादित ‘बैगपाइपर डीलक्स व्हिस्की’ तथा ‘ओल्ड कास्क डीलक्स XXX रम’ की बिक्री भी रोकी गई है। इसके अलावा, महाराष्ट्र में मोहन रॉकी स्प्रिंगवॉटर द्वारा निर्मित देश की बेहद लोकप्रिय ‘ओल्ड मोंक’ (Old Monk) रम के तीन अलग-अलग वेरिएंट्स को भी इस बैन के दायरे में रखा गया है। फिलहाल यह साफ नहीं हो सका है कि यह पाबंदी सिर्फ इन्हीं खास फैक्ट्रियों में बनी शराब पर लागू होगी या देश भर की अन्य यूनिट्स पर भी इसका असर पड़ेगा।

💸 मुनाफे के लिए शॉर्टकट अपनाना पड़ा भारी, FSSAI ने उत्पादों को करार दिया ‘सब-स्टैंडर्ड’

भारतीय खाद्य सुरक्षा नियमों के अनुसार, अल्कोहलिक पेय पदार्थों में केवल प्राकृतिक स्वाद बढ़ाने वाले तत्वों के इस्तेमाल की ही अनुमति है।

इसके विपरीत, जांचे गए उत्पादों में बाहरी कृत्रिम (आर्टिफिशियल) या प्रकृति के समान दिखने वाले रसायनों का उपयोग पाया गया। एफएसएसएआई ने इन सभी उत्पादों को ‘सब-स्टैंडर्ड’ यानी घटिया दर्जे का करार दिया है। इस तरह के शॉर्टकट अपनाकर शराब निर्माता कंपनियां उत्पादन की महंगी प्रक्रियाओं से बच जाती हैं। असल में शराब का असली फ्लेवर शीरा (मोलासेस), माल्ट या अंगूर जैसे प्राकृतिक कच्चे माल को सही तरीके से मैच्योर करने पर ही उभर कर आता है, जिसकी जगह इन कंपनियों ने केवल रसायनों का सहारा लिया।

👁️ FSSAI के निशाने पर दिग्गज बेवरेज कंपनियां, नियमों की अनदेखी पर जारी रहेगा एक्शन

यह पूरी कार्रवाई फूड और बेवरेज सेक्टर में एफएसएसएआई की बढ़ती सख्ती का ही एक हिस्सा है।

नियामक अब बाजार में बिकने वाले हर उस उत्पाद की बारीकी से जांच कर रहा है, जो ग्राहकों को भ्रमित कर सकता है। हाल ही में, प्राधिकरण ने पेप्सी तथा रेड बुल जैसी दिग्गज कंपनियों को भी निर्देश दिया था कि वे अपने अधिक कैफीन वाले पेय पदार्थों को ‘एनर्जी ड्रिंक’ के नाम से बेचना बंद करें। भले ही कंपनियों ने इस फैसले को टालने की कोशिश की, लेकिन नियामक अपने सख्त रुख पर पूरी तरह कायम रहा।

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